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हसरत ...

>> Sunday, 27 March 2011




एक वक्त था 
कि 
छाये रहते थे 
मेघ नेह के 
इन आँखों में , 
आज 
पसर गया है 
एक रेगिस्तान 
और 
तरस गयीं हैं 
ये आँखें 
एक बूँद 
नमी के लिए .

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पलाश

>> Friday, 18 March 2011




पलक पर जमी 
शबनम की बूंद को 
तर्जनी पर ले कर 
जैसे ही तुमने चूमा 
मेरी आँखों में 
न जाने कितने 
पलाश खिल गए ....


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बाढ़ का कहर

>> Sunday, 13 March 2011






सजा तो लिए थे 

मैंने पलकों पर 

फिर से 

मना कर 

रूठे हुए ख्वाब 


पर आज 

इतनी बारिश हुयी 

कि सारे ख्वाब 

बाढ़ में बह गए .......


.

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नीलकंठ

>> Sunday, 23 January 2011


संवादों का आज 
मंथन कर लिया 
उसमें से निकला 
हलाहल पी लिया .
तुमने नीलकंठ तो  देखा है न ? 
अब मुझे लोग नील कंठ कहते हैं .



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कताई

>> Friday, 31 December 2010



ख़्वाबों की पुनिया को 
आँखों की तकली से
काता  है शिद्दत से 
सारी ज़िंदगी मैंने 
कभी तो मन माफिक 
सूत  मिले , 
आज भी कातना
बदस्तूर जारी है ... 



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निर्मल धारा

>> Wednesday, 22 December 2010


मन की अगन को
बढा देती हैं
काम , क्रोध,
मोह , लोभ
की आहुतियाँ .

बढ़ाना है
गर इसको
तो
बहानी होगी
प्रेम की निर्मल धारा .


बढाने के दो अर्थ हैं --
१--- अधिक करना
२-- बुझाना

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सिहरन .....

>> Tuesday, 14 December 2010

रूखसार पर ढुलका 
पलक का इक बाल 
चुटकी से पकड़ 
रख दिया था 
तुमने मेरी 
उल्टी बंद 
मुट्ठी पर 
और कहा था कि
मांग लो 
जो मांगना है ,
बस यह पल 
यहीं ठहर जाए 
यही ख़याल आया था .
और फिर तुमने 
अपनी फूंक से 
उड़ा दिया था उसे .
आज भी मेरी 
मुट्ठी पर 
तेरी फूंक की सिहरन 
चस्पां  है ..





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