सुदृढ़ बाहें ...... ( पितृदिवस पर कुछ हाइकु )
>> Sunday, 16 June 2013
विशाल वृक्ष
जैसे देता है छाया
पिता ही तो हैं ।
पिता की गोदी
आश्रय संबल का
डर भला क्यों ?

पिता का डर
रखे अनुशासित
चढ़े सोपान ।
सुदृढ़ बाहें
आशवस्त है मन
पिता तो हैं ही ।
पिता का साया
हर बच्चे को मिले
यही है दुआ ।
पिता का हाथ
विशाल बरगद
सुकून मिले ।



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