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सुदृढ़ बाहें ...... ( पितृदिवस पर कुछ हाइकु )

>> Sunday, 16 June 2013


विशाल वृक्ष 
जैसे देता है छाया 
पिता ही तो हैं । 





पिता की गोदी 
आश्रय संबल का 
डर भला क्यों ? 
Father and Daughter Climbing Stairs    Stock Photo - Premium Rights-Managed, Artist: Peter Griffith, Code: 700-00549953

पिता का डर 
रखे    अनुशासित 
चढ़े सोपान । 

सुदृढ़ बाहें 
आशवस्त है  मन 
पिता  तो हैं ही । 

पिता का साया 
हर बच्चे को मिले 
यही है दुआ । 

पिता का हाथ 
विशाल बरगद 
सुकून मिले । 

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तल्ख स्मृतियाँ ( हाइकु )

>> Tuesday, 14 May 2013



कड़वी यादें 
  चीर देती हैं  सीना 
     मैं हुयी मौन  ।

************

पीड़ित यादें 
  झटक ही तो दीं थीं
    पीले पत्ते सी । 

******************

विष से बुझा 
  याद है  व्यंग्य  बाण
     मरा मेरा   'मैं' ।

*****************

तल्ख स्मृतियाँ 
   जेहन में घूमतीं 
      चैन न आए । 

*****************

खुद से जंग 
  जंगरहित यादें 
     निज़ात नहीं .... 

***************


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सच ठिठकी निगाहों का

>> Thursday, 21 February 2013


सफर के दौरान 
खिड़की से सिर टिकाये 
ठिठकी सी निगाहें 
लगता है कि 
देख रही हैं 
फुटपाथ और झाड़ियाँ 
पर निगाहें 
होती हैं स्थिर 
चलता रहता है  
संवाद मन ही मन 
उतर आता है 
पानी खारा 
खुद से बतियाते हुये 
खिड़की से झाँकती आंखे 
लगता है कि ठिठक गयी हैं । 

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शगल ....

>> Friday, 1 February 2013




मेरे मन के समंदर में
तुमने उछाल दिये 
बस यूं ही 
कुछ शब्दों के पत्थर 
और देखते रहे 
उनसे बने घेरे 
जो भावनाओं की लहरों पर 
बन औ  बिगड़ रहे थे 
शायद  तुम्हारा तो मात्र 
यह शगल रहा था 
पर वो पत्थर 
समंदर में कहीं 
गहरा गड़ा  था ।


 

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तोहफा जन्मदिन का

>> Thursday, 20 December 2012

प्रिय शिखा के जन्मदिन पर .... कुछ हाइकु रचनाएँ 


जन्मदिन का 
नन्हा सा  है  तोहफा 
मेरी ओर से 

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सालगिरह 
खुशियाँ ही खुशियाँ 
सहेजो तुम 


स्नेह से भरी 
रहे झोली तुम्हारी 
मिले आशीष । 

My Photo

कर्मयोगी सा 
बीते जीवन सारा 
यही कामना । 


हंसी चाँदनी 
चंचल चितवन 
देती सुकून । 

Shikha Varshney

तेरा नेह ही 
देता मुझे संबल 
मेरी प्रेरणा ।



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गमकती यादें ..../ हाइकु

>> Wednesday, 12 December 2012





यादों की झड़ी 
खुशी - गम  का साया 
आँखों से झरी ।


 
      
सुकून मिला 
तेरी यादों का टेसू 
गमक गया । 


यादों के घेरे 
तुम जैसे सम्मुख 
बंद थीं आँखें । 


अमलतास  सा 
खिला तेरा चेहरा 
यादों में बसा ।


कब भूली मैं 
पल -पल बिताया 
साथ सँजोया । 

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दीप बन कर देखो .... / हाइकु

>> Monday, 12 November 2012






मन का दीप 
रोशन कर देखो 
खुशी ही खुशी 



माटी का दिया 
एक रात की उम्र 
ज्योति से भरा ।


आम आदमी 
लगा रहा हिसाब 
कैसे हो पर्व ? 


लगाएँ बाज़ी 
परंपरा के नाम 
पत्तों का खेल । 


बम - पटाखे 
क्षण भर की खुशी 
धुआँ ही धुआँ ।


दीयों की बाती 
उजियारा  फैलाती 
स्वयं  जलती । 

दीपावली की  सभी को हार्दिक शुभकामनायें ।

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