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तिरसठ की चाह में छतीस साल ( हाईकू )

>> Sunday, 5 February 2012

 

छत्तीस साल 
किया समायोजन 
बीत ही गए |


सोचती हूँ मैं 
छत्तीस का आंकड़ा 
फिराए पीठ |


बीता समय 
तिरसठ की चाह 
मुक्कमल हो |


आगे का वक्त 
समन्वय करते 
गुजारें हम |

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बसंत एक रंग अनेक ( हाईकू )

>> Saturday, 28 January 2012




पीत वसन 
उल्लसित  है मन 
बसंत आया 

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श्रीहीन मुख 
गरीब का बसंत 
रोटी की चाह .

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फूली सरसों 
खेतों में हरियाली 
खिला  बसंत 

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भूखे किसान 
करते आत्महत्या 
बसंत कहाँ ? 

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आम आदमी 
रोज़ी-रोटी की फ़िक्र 
भूला  बसंत .

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सर्द मौसम ( हाईकू)

>> Friday, 20 January 2012



घना कोहरा 
धूप चांदनी लगे 
ढूंढें तपिश 




सर्द रात में 
फुटपाथ आबाद 
जिंदा हैं लाशें .

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कुनकुनी धूप

>> Sunday, 25 December 2011


 



धूप जो निकली है 
कुनकुनी सी 
मन होता है कि  
घूंट घूंट पी लूँ  
तृप्त हो जाऊं 
तो फिर मैं 
झंझावातों की 
आंधियां भी जी लूँ .


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तपिश

>> Sunday, 4 December 2011





मैं 
समंदर के साहिल पर 
भीगी रेत सी 
ज़रा सी कोशिश से  
बन जाती हूँ 
एक घरौंदा 
और फिर 
न जाने कौन सी  
तपिश से 
यूँ ही 
बिखर जाती हूँ 


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वक्त की आँधी

>> Thursday, 17 November 2011





मरुस्थल सी 
ज़िंदगी में 
छाई थी 
घटा कुछ देर 
और खिल गए थे  
चाहत के कुछ फ़ूल ,
वक्त की आँधी
उड़ा ले चली 
उन बादलों को
और अब फ़ूल 
मुरझा गए हैं 
नमी की कमी से 

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नमकीन खीर

>> Monday, 31 October 2011



मेरे 
ज़ख्मों पर 
छिडकते  हो 
जब भी नमक ,
तो 
खाने  में 
झर जाता है 
नमक सारा
और 
नमकीन हो जाती है 
खीर भी .



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