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Saturday, 6 March 2021

किरचें मन की

 


अचानक से 
छन्न से गिरा था
ग्लास काँच का ,
दूर दूर तक 
फैल गयीं थीं 
किरचें फर्श पर 
बड़े बड़े टुकड़े 
सहेज लिए थे
जल्दी से मैंने ,
कोशिश तो थी 
कि समेट लूँ  
सारी किरचें 
एक बार में ही ,
लेकिन जब तब 
दिख ही जाती हैं 
फर्श पर पड़ी हुई ,
बिल्कुल मेरी तरह ,
मैं भी तो यूँ ही 
बिखरी थी टूट कर ।





40 comments:

  1. टूटे हुए को कितना भी समेटूँ
    कुछ किर्चियों की चुभन ताउम्र रूलाती है।
    ------
    मर्मस्पर्शी भाव गढ़े हैं दी।
    कम शब्दों में सबकुछ कह देना हुनर है।
    सादर।



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    1. श्वेता ,
      मन के भाव में तक पहुँचे । बहुत बहुत शुक्रिया ।

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल रविवार (07-03-2021) को    "किरचें मन की"  (चर्चा अंक- 3998)     पर भी होगी। 
    -- 
    सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है। 
    --  
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ-    
    --
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' 
    --

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    1. शास्त्री जी ,
      बहुत बहुत आभार

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  3. किरचें फिर भी कहीं न कहीं रह जाती है
    जिंदगी में सबको समेटे रखना आसान नहीं रहता

    बहुत सुन्दर

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    1. कविता जी ,
      कहाँ आसान होता है ज़िन्दगी को समेटना । आभार ।

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  4. आपकी लिखी रचना "सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" आज शनिवार 06 मार्च 2021 को साझा की गई है........."सांध्य दैनिक मुखरित मौन में" पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

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  5. बहुत मर्मस्पर्शी सृजन । टूटा काँच और मन कहाँ जुड़ पाते हैं ...गहन भावाभिव्यक्ति ।

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    1. मीना जी ,
      कम शब्दों से भी आप जुड़ गयीं
      आभार

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  6. मनग्राही बेहतरीन कविता...

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  7. मन को छूती बहुत सुंदर अभिव्यक्ति।
    सादर

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    1. अनिता ,
      पसंद करने के लिए आभार ।

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  8. किरचें तो रह ही जातीं हैं कितना भी समेट लो। हृदयस्पर्शी पंक्तियां।

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  9. शिखा ,
    किरचें हैं तो चुभेगी ही न । बात दिल तक पहुँची । शुक्रिया

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  10. इतने कच्चे काँच सा
    क्यूँ होता है ये मन
    कि-
    हाथ से छूटा और
    छन्न से बिखर गया
    🌹 बहुत सुन्दर रचना संगीती जी👌👌

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  11. बस मन तो कच्चे काँच से होता है। क्या करें अब ऐसा ही है मेरा मन 😄😄😄😄

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  12. मन के क्या कहने ..
    कब कांच सा टूटकर बिखर जाए..
    कब शिलाओं जैसा पत्थर दिल हो जाए..
    किसके बस में रहा है ये..टूटने में सबसे आगे रहा है ये..

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    1. मन के भावों के आगे भी भाब बढ़ाये तुमने ।सच है पत्थर भी हो जाता है कभी कभी । शुक्रिया जिज्ञासा ।

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  13. अद्भुत लेखन
    गहन भाव

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  14. हा ! महीन कांच की किरचें जिस तरह कई दिनों तक मिलती रहती हैं,उसी तरह मन को समेटने के बाद भी चोटें रह-रह कर दुखती हैं । आपने सरल और सहज शब्दों में यह बात बखूबी कह दी है ।

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    1. नुपुरं ,
      मन के भाव कितनी खूबसूरती से तुमने समझ कर लिख दिए । बहुत सा शुक्रिया

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  15. आदरणीया संगीता दी, आपकी पाँच लिंकों की विशेष प्रस्तुति भी देखी थी, किंतु मैं उस पर नहीं लिख पाई क्योंकि मेरे चाचाजी के देहावसान की खबर मिलने से मन व्यथित हो गया था। बहुत अच्छा लगता है जब हमारे पुराने और अनुभवी ब्लॉगर्स का लिखा हुआ कुछ पढ़ने को मिलता है और वे अपने हमसे अपने अनुभव बाँटते हैं। ब्लॉग जगत भी एक परिवार सा ही लगता है अब। ज्यादा दिन तक इससे दूर नहीं रह पाते हैं। आपके समय के ब्लॉगर्स पुनः सक्रिय होंगे तो हम सभी को बहुत अच्छा लगेगा। सादर।

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    1. ओह, दुखद समाचार दिया ईश्वय इस घड़ी आपको दुख सहने की क्षमता दे ।

      सक्रिय होने का प्रयास कर रही हूँ बाकी तो सबको स्वयं ही सक्रिय होने होगा । आभार

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  16. सारी किरचें
    एक बार में ही ,
    लेकिन जब तब
    दिख ही जाती हैं ...
    सच में, सारी किरचें एक बार में समेटी नहीं जाती हैं दी, एकाध टुकड़ा घर के/मन के कोने में पड़ा मिल ही जाता है देर सबेर....

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    1. रचना को सराहने के लिए दिल से आभार

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  17. गहन भाव, मन को छूती सच्ची बात बताती सुंदर बहुत ही सुंदर रचना, महिला दिवस की बधाई हो, नमन

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    1. ज्योति ,
      आपको भी महिला दिवस की शुभकामनाएँ ।
      रचना को सराहने के लिए शुक्रिया।

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  18. एक बार में सभी कुछ समेटना कहाँ सम्भव हो पाता है... सुन्दर कविता....

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  19. सुंदर और हृदयस्पर्शी सृजन। इंसान और काँच में ये समानता है। दोनो जब टूटते हैं तो समेटना मुश्किल होता है। सादर।

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    1. वीरेंद्र जी ,
      सही कहा आपने इंसान भी कहाँ सिमट पाता है ।

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  20. किरचों की चुभन , छलनी हुआ मन ।

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  21. अमृता ,
    आप ब्लॉग पर सक्रीय रहीं यह देख कर बहुत अच्छा लग रहा है . शुक्रिया

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  22. ख्वाहिश थी मिरि ,

    कभी मेरे लिए

    तेरी आँख से

    एक कतरा क़तरा निकले

    भीग जाऊँ मैं

    इस क़दर उसमें

    कि समंदर भी

    उथला निकले ।

    छोटी नज़्म कहें या क्षणिका बेहद खूबसूरत ख्याल है।

    क्षेपक :

    ख्वाइश थी मिरि ,

    मौत बन तू आये ,

    बादे मर्ग ,

    तेरे साथ रहूं।

    विशेष :बादे मर्ग= मौत के बाद।

    छोटी बहर की अतिथि नज़्म :संगीता स्वरूप गीत

    सहभावी -सहभागी :वीरुभाई (वीरेंद्र शर्मा )

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  23. "मैं भी तो यूँ ही
    बिखरी थी टूट कर।" ... बहुत ही मार्मिक बिम्ब .. काँच के गिलासों की हर छोटी-बड़ी किरचों को, भले ही अपनी हथेली घायल करके, तो फिर भी हम समेट कर कर्कट को सौंप देते हैं पर .. स्वयं के बिखरने पर, स्वयं ही बिखरना होता है, स्वयं ही समेटना होता है, स्वयं ही लड़खड़ाना होता है, स्वयं ही सम्भालना होता है .. कोई दूसरा कहाँ आ पाता है भला .. शायद ...

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