विश्वास की ईंट
>> Thursday, 30 September 2010
झूठ की एक
नन्हीं सी फांस
उखाड़ देती है
विश्वास की
जमी हुई नींव को
फिर कितना ही
सच का गारा
लगाओ
जम नहीं पाती
एक भी ईंट
विश्वास की ...
खलिश होती है तो यूँ ही बयां होती है , हर शेर जैसे सीप से निकला हुआ मोती है
बिना काजल के हैं कजरारी आँखें
पैनी धार सी हैं ये कटारी आँखें
वार तो नहीं किया तूने मुझ पर
क़त्ल कर गयीं ये तेरी प्यारी आँखें
Read more...खामोश रह कर भी तुझसे बात करते हैं
आवाज़ नहीं आती पर लब हिलते हैं
ज़रा ध्यान से सुन कान लगा कर ज़रा
चुप रह कर भी हम बहुत कुछ कहते हैं.
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