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रंगरेज़

>> Friday, 23 April 2021

 


इश्क़ तो 


खुद है रंगरेज़


रंग देता 


मन को 


जैसे हो केसर ,


रे मन !


कभी तो 


इस रंग के 


समंदर  में उतर । 





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ख्वाहिश ....

>> Wednesday, 31 March 2021

 


ख्वाहिश थी मेरी कि


कभी मेरे लिए 

तेरी आँख से 

एक कतरा निकले 

भीग जाऊँ मैं 

इस कदर उसमें 

कि  समंदर भी 

कम गहरा निकले ।




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इतिहास या इति का हास .

>> Sunday, 14 March 2021

जब जब 
मैंने इतिहास के 
पन्ने पढ़े हैं ,
तब तब 
हर खंडहर की नींव में 
मुझे गड़े  मुर्दे मिले हैं ,
नींव पर पड़ते ही 
किसी कुदाल का प्रहार ,
बिलबिला जाते हैं 
अक्सर इतिहासकार ।
असल में 
होता है जितना 
पुराना इतिहास ,
बढ़ती जाती है  
मुर्दों की संख्या , 
क्यों कि जान चुके है 
वो कि 
वो मौन हैं तो 
ज़िंदा हैं , 
ज़िंदा रहने के लिए 
मुर्दा होना ज़रूरी है 
लम्बे इतिहासों में 
अपने  हिसाब से ,
बदल दिया जाता है 
अक्सर इतिहास ,
नई पीढ़ी से इस तरह 
किया जाता है परिहास ।
फिर भले ही चाहे वो 
चार हज़ार दिन का हो ,
या हो चार हज़ार साल का
किसी को नहीं होता 
मलाल इस बात का ,
चकित सी जनता 
समझ नहीं पाती 
इतिहास का सच ,
मान लेती है उसे सही 
दिखता है  सामने जो बस  ।
तो फिर क्यों भला 
उखाड़े जाएँ मुर्दे 
जो गड़े हुए हैं 
हम ज़िंदा भी तो 
मुर्दों जैसे पड़े हुए हैं ।




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किरचें मन की

>> Saturday, 6 March 2021

 


अचानक से 
छन्न से गिरा था
ग्लास काँच का ,
दूर दूर तक 
फैल गयीं थीं 
किरचें फर्श पर 
बड़े बड़े टुकड़े 
सहेज लिए थे
जल्दी से मैंने ,
कोशिश तो थी 
कि समेट लूँ  
सारी किरचें 
एक बार में ही ,
लेकिन जब तब 
दिख ही जाती हैं 
फर्श पर पड़ी हुई ,
बिल्कुल मेरी तरह ,
मैं भी तो यूँ ही 
बिखरी थी टूट कर ।





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ऐ ज़िन्दगी बता !

>> Wednesday, 3 March 2021

 



दरक गया है 

इस कदर दिल 
कि ऐ ज़िन्दगी 
बता कैसे मैं 
तेरा  ऐतबार करूँ ? 
अपनी ही सोचों में 
गुम है मन मेरा 
तो भला बता कि
मैं कैसे तुझसे 
प्यार करूँ ? 

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और - बसन्त मुरझा गया

>> Friday, 26 February 2021



सर ए राह 

मुड़ गए थे कदम 
पुराने गलियारों में 
अचानक ही 
मिल गयीं थीं 
पुरानी उदासियाँ 
पूछा उन्होंने 
कैसी हो ? क्या हाल है ? 
मुस्कुरा कर 
कहा मैंने 
मस्तम - मस्त 
बसन्त छाया है ।
सुनते ही इतना 
जमा लिया कब्ज़ा 
उन्होंने मेरे ऊपर 
और -
बसन्त मुरझा गया । 





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मन पलाश

>> Saturday, 20 February 2021

 


बदला तो नहीं
कुछ भी ऐसा 
फिर - 
क्यों हो रहा 
भला ये बसन्त ? 
बस मैंने
भरे घट से 
उलीच दिए थे
दो अंजुर भर 
कसैले शब्द ,
और मन 
पलाश  हो गया ।




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