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बरगद !!!!
>> Saturday, 8 May 2021
ज़िन्दगी की धूप में
छाँव की तलाश में
और
बरगद
अपनी बाहें फैलाये
रह जाता है
एक जगह
ठिठका सा .
रंगरेज़
>> Friday, 23 April 2021
इश्क़ तो
खुद है रंगरेज़
रंग देता
मन को
जैसे हो केसर ,
रे मन !
कभी तो
इस रंग के
समंदर में उतर ।
ख्वाहिश ....
>> Wednesday, 31 March 2021
ख्वाहिश थी मेरी कि
कभी मेरे लिए
तेरी आँख से
एक कतरा निकले
भीग जाऊँ मैं
इस कदर उसमें
कि समंदर भी
कम गहरा निकले ।
ऐ ज़िन्दगी बता !
>> Wednesday, 3 March 2021
दरक गया है
इस कदर दिल
कि ऐ ज़िन्दगी
बता कैसे मैं
तेरा ऐतबार करूँ ?
अपनी ही सोचों में
गुम है मन मेरा
तो भला बता कि
मैं कैसे तुझसे
प्यार करूँ ?
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सच ठिठकी निगाहों का
>> Thursday, 21 February 2013
सफर के दौरान
खिड़की से सिर टिकाये
ठिठकी सी निगाहें
लगता है कि
देख रही हैं
फुटपाथ और झाड़ियाँ
पर निगाहें
होती हैं स्थिर
चलता रहता है
संवाद मन ही मन
उतर आता है
पानी खारा
खुद से बतियाते हुये
खिड़की से झाँकती आंखे
लगता है कि ठिठक गयी हैं ।
खुश्क आँखें
>> Tuesday, 17 July 2012
अब नम नहीं होतीं
मेरी आँखें
ज़िंदगी की तपिश ने
कर दिया है
खुश्क उनको
अब तो जब भी
झपकती हूँ पलक
तो होता है बस
एक एहसास
चुभन का ।
( आँखों में कुछ दिनों से जलन का एहसास हो रहा था , आज डॉक्टर को दिखाईं तो उन्होने बताया कि नमी सूख गयी है इसीलिए इरिटेशन होता है )
इंतज़ार रंगों का
>> Thursday, 14 June 2012
चाँद ने आज कोई
साजिश की है
चाँदनी भी आज
कहीं दिखती नहीं है
मन की झील पर
जो अक्स बना था
उसकी रंगत भी
अब खिलती नहीं है ,
कर रही हूँ इंतज़ार
नन्ही सी किरण का
ये भोर भला अब
क्यों होती नहीं है
आसमां की रंगत कुछ
धूमिल सी है
बादलों की स्याही
कुछ कहती नहीं है
कहाँ से लाऊं मैं
वो इंद्र्धनुष
रंगों की सुर्खी भी
मन रंगती नहीं है ॥
तपिश
>> Sunday, 4 December 2011
मैं
समंदर के साहिल पर
भीगी रेत सी
ज़रा सी कोशिश से
बन जाती हूँ
एक घरौंदा
और फिर
न जाने कौन सी
तपिश से
यूँ ही
बिखर जाती हूँ
वक्त की आँधी
>> Thursday, 17 November 2011
मरुस्थल सी
ज़िंदगी में
छाई थी
घटा कुछ देर
और खिल गए थे
चाहत के कुछ फ़ूल ,
वक्त की आँधी
उड़ा ले चली
उन बादलों को
और अब फ़ूल
मुरझा गए हैं
नमी की कमी से
रेतीले ख्वाब
>> Friday, 23 September 2011
ख्यालों के समंदर से
निकली एक लहर
भिगो देती है
मेरे ज़िंदगी के साहिल को
और मैं
नम हुयी रेत से
बनाती हूँ
ख़्वाबों के घरौंदे
जिन्हें
हकीकती आफताब
सुखा देता है आकर
और वो फिर
बिखर जाते हैं
सूखी रेत से ....
उदासी के जाले
>> Sunday, 28 August 2011
वक्त के हाथों
पड़ गए थे
आँखों में
उदासी के जाले
आज उन्हें
धो - धो कर
निकाला है,
चेहरे की
नमी को
हकीकत की
गर्मी से
सुखाया है .
अजनबी ...
>> Tuesday, 9 August 2011
तल्ख़ जुबां
करती है असर
जब होता है
अपनापन
कहीं न कहीं
जब हो गए
अजनबी
तो सच ही
तल्खी जाती रही ..
चटख धूप
>> Tuesday, 2 August 2011
यादों की चादर में
समेट लायी हूँ
खुशियों की
चटख धूप
गम के
बादलों की ओट से
उग आया है
एक सतरंगी
केसरिया चावल
>> Saturday, 9 July 2011
सोचा था
मन की हांड़ी में
ज़िंदगी का केसरिया
चावल पकाऊँगी खास
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पर न केसरिया
प्रेम मिला
और न ही
भावनाओं की मिठास .
चवन्नियां ख्यालों की
>> Friday, 1 July 2011
पोटली में बंधी चवन्नियां
खनखनाती हैं ज्यों
ख्याल भी मेरे मन में
कुछ इसी तरह बजते हैं
रही नहीं कीमत
जैसे अब उनकी
मेरे ख्याल भी
धराशायी हो गए हैं ..
दंश ..
>> Tuesday, 24 May 2011
जब भी
मन के
चूल्हे पर
मैंने
ख़्वाबों क़ी
रोटी सेकी
तेरे
दंश भरे
अंगारों ने
उसे जला डाला ...
हरसिंगार से ख्वाब
>> Tuesday, 10 May 2011
हरसिंगार से
मेरे ख्वाब
महकते रहे
सारी रात
पर सुबह के
सूरज ने आ
उन्हें मिट्टी में
मिला दिया
समंदर रेत का
>> Wednesday, 13 April 2011
पलकों को
निचोड़ कर
जब मैंने
खोलीं थीं
आँखें
रेत का
समंदर उनमें
नज़र आया था
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