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उद्विग्नता

>> Tuesday, 27 July 2021

 


जीवन की उष्णता 
अभी ठहरी है ,
उद्विग्न है मन 
लेकिन आशा भी 
नहीं कर पा रही 
इस मौन के 
वृत्त  में प्रवेश 
बस एक उच्छवास ले 
ताकते हैं बीता कल ,
निर्निमेष नज़रों से 
लगता है कि 
अब पाना कुछ नहीं 
बस खोते ही 
जा रहे हर पल।

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बरगद !!!!

>> Saturday, 8 May 2021

 


ज़िन्दगी की धूप  में



राही  बढ़ जाता है आगे

छाँव  की तलाश में

और

बरगद

अपनी बाहें फैलाये

रह जाता है

एक जगह

ठिठका सा .





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रंगरेज़

>> Friday, 23 April 2021

 


इश्क़ तो 


खुद है रंगरेज़


रंग देता 


मन को 


जैसे हो केसर ,


रे मन !


कभी तो 


इस रंग के 


समंदर  में उतर । 





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ख्वाहिश ....

>> Wednesday, 31 March 2021

 


ख्वाहिश थी मेरी कि


कभी मेरे लिए 

तेरी आँख से 

एक कतरा निकले 

भीग जाऊँ मैं 

इस कदर उसमें 

कि  समंदर भी 

कम गहरा निकले ।




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किरचें मन की

>> Saturday, 6 March 2021

 


अचानक से 
छन्न से गिरा था
ग्लास काँच का ,
दूर दूर तक 
फैल गयीं थीं 
किरचें फर्श पर 
बड़े बड़े टुकड़े 
सहेज लिए थे
जल्दी से मैंने ,
कोशिश तो थी 
कि समेट लूँ  
सारी किरचें 
एक बार में ही ,
लेकिन जब तब 
दिख ही जाती हैं 
फर्श पर पड़ी हुई ,
बिल्कुल मेरी तरह ,
मैं भी तो यूँ ही 
बिखरी थी टूट कर ।





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ऐ ज़िन्दगी बता !

>> Wednesday, 3 March 2021

 



दरक गया है 

इस कदर दिल 
कि ऐ ज़िन्दगी 
बता कैसे मैं 
तेरा  ऐतबार करूँ ? 
अपनी ही सोचों में 
गुम है मन मेरा 
तो भला बता कि
मैं कैसे तुझसे 
प्यार करूँ ? 

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सच ठिठकी निगाहों का

>> Thursday, 21 February 2013


सफर के दौरान 
खिड़की से सिर टिकाये 
ठिठकी सी निगाहें 
लगता है कि 
देख रही हैं 
फुटपाथ और झाड़ियाँ 
पर निगाहें 
होती हैं स्थिर 
चलता रहता है  
संवाद मन ही मन 
उतर आता है 
पानी खारा 
खुद से बतियाते हुये 
खिड़की से झाँकती आंखे 
लगता है कि ठिठक गयी हैं । 

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खुश्क आँखें

>> Tuesday, 17 July 2012






अब नम नहीं होतीं 
मेरी आँखें 
ज़िंदगी की तपिश ने 
कर दिया है 
खुश्क उनको 
अब तो जब भी 
झपकती हूँ पलक 
तो होता है बस 
एक एहसास 
चुभन का । 


( आँखों में कुछ दिनों से जलन का एहसास हो रहा था  , आज डॉक्टर  को दिखाईं तो उन्होने बताया कि नमी सूख गयी है इसीलिए इरिटेशन होता है )


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इंतज़ार रंगों का

>> Thursday, 14 June 2012



चाँद ने आज कोई 
साजिश की है 
चाँदनी भी आज 
कहीं दिखती नहीं है 
मन की झील पर 
जो अक्स बना था
उसकी रंगत भी 
अब खिलती नहीं है ,
कर रही हूँ इंतज़ार 
नन्ही सी किरण का 
ये भोर भला अब 
क्यों होती नहीं है 
आसमां की रंगत कुछ 
धूमिल सी है 
बादलों की स्याही 
कुछ कहती नहीं है 
कहाँ से लाऊं  मैं 
वो इंद्र्धनुष 
रंगों की सुर्खी भी 
मन रंगती नहीं है ॥ 



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तपिश

>> Sunday, 4 December 2011





मैं 
समंदर के साहिल पर 
भीगी रेत सी 
ज़रा सी कोशिश से  
बन जाती हूँ 
एक घरौंदा 
और फिर 
न जाने कौन सी  
तपिश से 
यूँ ही 
बिखर जाती हूँ 


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वक्त की आँधी

>> Thursday, 17 November 2011





मरुस्थल सी 
ज़िंदगी में 
छाई थी 
घटा कुछ देर 
और खिल गए थे  
चाहत के कुछ फ़ूल ,
वक्त की आँधी
उड़ा ले चली 
उन बादलों को
और अब फ़ूल 
मुरझा गए हैं 
नमी की कमी से 

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रेतीले ख्वाब

>> Friday, 23 September 2011


Seashore : sea seaside to spain.

ख्यालों के समंदर से 
निकली एक लहर 
भिगो देती है 
मेरे ज़िंदगी के साहिल को 
और मैं 
नम हुयी रेत से 
बनाती हूँ 
ख़्वाबों के घरौंदे                                                              
जिन्हें 
हकीकती आफताब 
सुखा देता है आकर 
और वो फिर 
बिखर जाते हैं 
सूखी रेत से ....


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उदासी के जाले

>> Sunday, 28 August 2011




वक्त के हाथों 
पड़ गए थे 
आँखों में 
उदासी के जाले
आज उन्हें 
धो - धो कर 
निकाला है, 
चेहरे  की 
नमी को 
हकीकत की 
गर्मी से 
सुखाया है .

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अजनबी ...

>> Tuesday, 9 August 2011




तल्ख़ जुबां 
करती है असर 
जब होता है 
अपनापन 
कहीं न कहीं 
जब हो गए 
अजनबी 
तो सच ही 
तल्खी जाती रही ..

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चटख धूप

>> Tuesday, 2 August 2011




यादों की चादर में 
समेट लायी हूँ 
खुशियों की 
चटख धूप 
गम के 
बादलों की ओट से 
उग आया है 
एक सतरंगी 


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केसरिया चावल

>> Saturday, 9 July 2011


सोचा था 
मन की  हांड़ी में 
ज़िंदगी का केसरिया 
चावल पकाऊँगी  खास 
पर न केसरिया 
प्रेम मिला 
और न ही 
भावनाओं की मिठास .

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चवन्नियां ख्यालों की

>> Friday, 1 July 2011

    


पोटली में बंधी चवन्नियां 
खनखनाती  हैं ज्यों 
ख्याल भी मेरे मन में 
कुछ इसी तरह बजते हैं 
रही नहीं कीमत 
जैसे अब  उनकी 
मेरे ख्याल  भी 
धराशायी  हो गए हैं ..



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दंश ..

>> Tuesday, 24 May 2011




जब  भी 
मन के 
चूल्हे पर 
मैंने 
ख़्वाबों क़ी
रोटी  सेकी
तेरे 
दंश भरे 
अंगारों ने 
उसे जला डाला ...


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हरसिंगार से ख्वाब

>> Tuesday, 10 May 2011



हरसिंगार से 

मेरे ख्वाब 

महकते रहे 

सारी रात 

पर सुबह  के 

सूरज ने आ 

उन्हें मिट्टी में 

मिला दिया 

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समंदर रेत का

>> Wednesday, 13 April 2011


पलकों को 
निचोड़ कर 
जब मैंने 
खोलीं थीं 
आँखें 
रेत का 
समंदर उनमें 
नज़र आया था 


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