नया ख्वाब
>> Sunday, 7 February 2010
मन की अल्हड़ता से
फूट पड़ते हैं सोते भी
रेगिस्तान में,
साहिल पर बैठ
रेत में उंगली फिरा
एक ख्वाब नया बुन
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खलिश होती है तो यूँ ही बयां होती है , हर शेर जैसे सीप से निकला हुआ मोती है
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