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नमक

>> Wednesday, 17 March 2010



समझौतों ने कभी भी
मरहम नहीं लगाया
मन की
दरार पर



ये तो
वो नमक है
जो लोग लगा देते हैं
अक्सर जख्म पर ,

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वजूद

>> Thursday, 11 March 2010



वजूद के टुकड़े

क्या बांटेंगी

उदास शामें

और ग़मज़दा रातें




जिसने

टुकड़े टुकड़े

जोड़ कर ही

बनाया हो

वजूद अपना .




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ख़्वाबों की कश्ती

>> Sunday, 7 March 2010



ख़्वाबों को कश्ती में


डाल कर

उतार दिया है

इस जहाँ के

दरिया में

मंझधार से बचे

तो बेड़ा पार लगे.

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शबनम .

>> Friday, 5 March 2010


समंदर छलका



जो आँखों का


तो,


बह आई एक लहर


मन के साहिल की


तपती रेत पर


पड़ गयी हो


जैसे शबनम .
 
 
 
 
 
 
 
 
 

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आईना

>> Saturday, 27 February 2010

रख दिया है



फिर से एक


नया आईना


मैंने ख़्वाबों के सामने


और


क्षत -विक्षत से ख्वाब


लगें हैं सजने


फिर आईने में

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गुजारिश

>> Sunday, 21 February 2010





टुकड़ा ए दिल



सहेज लिया है मैंने


तू बस


फिरा दे ज़ख्म पर


अपनी अंगुली .

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ख्वाब

>> Saturday, 13 February 2010





ख्वाब बुन दिया है मैंने



रेत पर उँगलियों से


कि रात भर तेरी


खुशबू से महकती रही


सहर होते ही देखा मैंने


कि मेरी झोली तूने


पारिजात से भर दी थी ...
 
 
 

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रफ़्तार

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