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और - बसन्त मुरझा गया

>> Friday, 26 February 2021



सर ए राह 

मुड़ गए थे कदम 
पुराने गलियारों में 
अचानक ही 
मिल गयीं थीं 
पुरानी उदासियाँ 
पूछा उन्होंने 
कैसी हो ? क्या हाल है ? 
मुस्कुरा कर 
कहा मैंने 
मस्तम - मस्त 
बसन्त छाया है ।
सुनते ही इतना 
जमा लिया कब्ज़ा 
उन्होंने मेरे ऊपर 
और -
बसन्त मुरझा गया । 





20 comments:

Meena Bhardwaj Fri Feb 26, 10:38:00 am  

कहा मैंने
मस्तम - मस्त
बसन्त छाया है ।
सुनते ही इतना
जमा लिया कब्ज़ा
उन्होंने मेरे ऊपर
और -
बसन्त मुरझा ..
मर्मस्पर्शी भावाभिव्यक्ति ।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक' Fri Feb 26, 11:55:00 am  

बहुत सुन्दर और सारगर्भित रचना।

shikha varshney Fri Feb 26, 05:22:00 pm  

इन उदासियों को मूंह लगाना ही नहीं चाहिए। झिटक दो जहाँ मिलें।

Jigyasa Singh Sat Feb 27, 12:17:00 am  

ये उदासी किसी न किसी बहाने दस्तक दे ही देती है..बड़ी बेशर्म है..सुन्दर कृति के लिए हार्दिक शुभकामनाएं..

ज्योति सिंह Sat Feb 27, 12:18:00 am  

लाजवाब, बहुत ही सुंदर रचना संगीता जी, बधाई हो

Sweta sinha Sat Feb 27, 11:19:00 am  

जी नमस्ते,
आपकी लिखी रचना आज शनिवार 27 फरवरी 2021 को साझा की गई है......... "सांध्य दैनिक मुखरित मौन " पर आप भी सादर आमंत्रित हैं ....धन्यवाद! ,

संगीता स्वरुप ( गीत ) Sat Feb 27, 01:15:00 pm  

शास्त्री जी शुक्रिया

संगीता स्वरुप ( गीत ) Sat Feb 27, 01:16:00 pm  

बस जी छिटक दीं, तुम कहो और न माने ये तो हो नहीं सकता न

संगीता स्वरुप ( गीत ) Sat Feb 27, 01:18:00 pm  

सच्ची , बड़ी बेशर्म हैं । सोच कर हँसी आ रही है । शुक्रिया जिज्ञासा । उदासी में भी हँसाने का ।

अनीता सैनी Sun Feb 28, 10:06:00 pm  

वाह!मन को छूती बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति।
सादर

Dr Varsha Singh Mon Mar 01, 08:53:00 pm  

उफ ! ... उदासियों से मुलाक़ात की कितनी निराली बयानगी !

साधुवाद आदरणीया 🙏

संगीता स्वरुप ( गीत ) Tue Mar 02, 12:34:00 pm  

शुक्रिया वर्षा जी । आप महसूस कर सकीं ।

Surendra shukla" Bhramar"5 Wed Mar 03, 08:51:00 am  

सारगर्भित, विचारणीय, जिंदगी के रंग में खुशियों के साथ उदासियां भी हैं ही, आइए खुशियों बरसाएं और पाएं जय हो

संजय भास्‍कर Fri Mar 05, 12:27:00 pm  

बहुत ही सुंदर रचना संगीता जी

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