ऐसा तेरा आना .............
>> Wednesday, 2 June 2010
ख़्वाबों में
तेरा आना
और
बिना दस्तक दिए
चले जाना
सालता है मुझे
जागी आँखों से
गुमसुम सी
कदमों के निशाँ
गिना करती हूँ
.
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खलिश होती है तो यूँ ही बयां होती है , हर शेर जैसे सीप से निकला हुआ मोती है
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