मुखरित मौन ...
>> Saturday, 30 October 2010
भाषा हो
मौन की ,
एहसास हों
ज़िंदगी के
व्यवहार में थोड़ी
गहराई लाइए
भावनाएं हो जाएँ
न कहीं दूषित
इसलिए मुझे
शब्द नहीं चाहिए .
सूखे फूल और बहार
>> Tuesday, 12 October 2010
यादों के सूखे फूल
आज भी
महका रहे हैं
मेरी ज़िंदगी की
किताब को
इस महक से
ज़िंदगी में
आज भी
बहार है |
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छोटी कविता
विश्वास की ईंट
>> Thursday, 30 September 2010
झूठ की एक
नन्हीं सी फांस
उखाड़ देती है
विश्वास की
जमी हुई नींव को
फिर कितना ही
सच का गारा
लगाओ
जम नहीं पाती
एक भी ईंट
विश्वास की ...
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छोटी कविता,
सर्वाधिकार सुरक्षित
राख बनती ख्वाहिशें
>> Tuesday, 21 September 2010
कहा था यूँ
कि
अब जँचती हैं..
तुम्हारी..
कजरारी आँखें
पर सच
काली नहीं हैं
मेरी आँखें ,
बस
राख बन गयी हैं
कुछ ख्वाहिशें ...
दीपक तले अँधेरा ..
>> Monday, 13 September 2010
ज़िंदगी के चाक पर
भावनाओं की मिट्टी गूँथ
छोटी छोटी ख्वाहिशों के
दिए बना
चढा दिया था
यथार्थ के ताप पर
जिम्मेदारियों के
तेल में भिगो
अरमानो की बाती
जला दी थी
आज उजाला है चारों ओर
बस है तो
दीपक तले अँधेरा ....
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छोटी कविता
खामोशियाँ ..
>> Monday, 6 September 2010
खामोशियाँ
ठहर गयीं हैं
आज
आ कर
मेरे लबों पर
खानाबदोशी की
ज़िंदगी शायद
उन्हें
रास नहीं आई
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