चटख धूप
>> Tuesday, 2 August 2011
यादों की चादर में
समेट लायी हूँ
खुशियों की
चटख धूप
गम के
बादलों की ओट से
उग आया है
एक सतरंगी
खलिश होती है तो यूँ ही बयां होती है , हर शेर जैसे सीप से निकला हुआ मोती है
© Free Blogger Templates Wild Birds by Ourblogtemplates.com 2008
Back to TOP