शगल ....
>> Friday, 1 February 2013
मेरे मन के समंदर में
तुमने उछाल दिये
बस यूं ही
कुछ शब्दों के पत्थर
और देखते रहे
उनसे बने घेरे
जो भावनाओं की लहरों पर
बन औ बिगड़ रहे थे
शायद तुम्हारा तो मात्र
यह शगल रहा था
पर वो पत्थर
समंदर में कहीं
गहरा गड़ा था ।





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