नीलकंठ
>> Sunday, 23 January 2011
संवादों का आज
मंथन कर लिया
उसमें से निकला
हलाहल पी लिया .
तुमने नीलकंठ तो देखा है न ?
अब मुझे लोग नील कंठ कहते हैं .
खलिश होती है तो यूँ ही बयां होती है , हर शेर जैसे सीप से निकला हुआ मोती है
मन की अगन को
बढा देती हैं
काम , क्रोध,
मोह , लोभ
की आहुतियाँ .
बढ़ाना है
गर इसको
तो
बहानी होगी
प्रेम की निर्मल धारा .
बढाने के दो अर्थ हैं --
१--- अधिक करना
२-- बुझाना

तेरी बातों की
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