इंतज़ार रंगों का
>> Thursday, 14 June 2012
चाँद ने आज कोई
साजिश की है
चाँदनी भी आज
कहीं दिखती नहीं है
मन की झील पर
जो अक्स बना था
उसकी रंगत भी
अब खिलती नहीं है ,
कर रही हूँ इंतज़ार
नन्ही सी किरण का
ये भोर भला अब
क्यों होती नहीं है
आसमां की रंगत कुछ
धूमिल सी है
बादलों की स्याही
कुछ कहती नहीं है
कहाँ से लाऊं मैं
वो इंद्र्धनुष
रंगों की सुर्खी भी
मन रंगती नहीं है ॥


