पन्ने पढ़े हैं ,तब तब
हर खंडहर की नींव में
मुझे गड़े मुर्दे मिले हैं ,
नींव पर पड़ते ही
किसी कुदाल का प्रहार ,
बिलबिला जाते हैं
अक्सर इतिहासकार ।
असल में
होता है जितना
पुराना इतिहास ,
बढ़ती जाती है
मुर्दों की संख्या ,
क्यों कि जान चुके है
वो कि
वो मौन हैं तो
ज़िंदा हैं ,
ज़िंदा रहने के लिए
मुर्दा होना ज़रूरी है
लम्बे इतिहासों में
अपने हिसाब से ,
बदल दिया जाता है
अक्सर इतिहास ,
नई पीढ़ी से इस तरह
किया जाता है परिहास ।
फिर भले ही चाहे वो
चार हज़ार दिन का हो ,
या हो चार हज़ार साल का
किसी को नहीं होता
मलाल इस बात का ,
चकित सी जनता
समझ नहीं पाती
इतिहास का सच ,
मान लेती है उसे सही
दिखता है सामने जो बस ।
तो फिर क्यों भला
उखाड़े जाएँ मुर्दे
जो गड़े हुए हैं
हम ज़िंदा भी तो
मुर्दों जैसे पड़े हुए हैं ।