बासंती मन
>> Wednesday, 10 February 2021
बड़े जतन से
छिपा रखी थी
एक पोटली
मन के किसी कोने में
खोल दी आज
गिरह लबों की
खुलते ही गाँठ
सारे शिकवे - शिकायतें
चाहे - अनचाहे
ख्वाब और ख्वाहिशें
बिखर गए सामने ।
उठा कर नज़र से
एक एक को
समेट ही तो लिया
तुमने बड़े करीने से ,
बस -
मन बासन्ती हो गया ।
संगीता स्वरुप
10 - 02- 21
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