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सच ठिठकी निगाहों का

>> Thursday, 21 February 2013


सफर के दौरान 
खिड़की से सिर टिकाये 
ठिठकी सी निगाहें 
लगता है कि 
देख रही हैं 
फुटपाथ और झाड़ियाँ 
पर निगाहें 
होती हैं स्थिर 
चलता रहता है  
संवाद मन ही मन 
उतर आता है 
पानी खारा 
खुद से बतियाते हुये 
खिड़की से झाँकती आंखे 
लगता है कि ठिठक गयी हैं । 

55 comments:

ऋता शेखर मधु Thu Feb 21, 08:33:00 am  

सही कहा दी...सफर जारी रहता है...पर मन स्थिर|

प्रवीण पाण्डेय Thu Feb 21, 08:42:00 am  

ठिठकी आँखों में मन सदा ही गतिमय रहता है, न जाने क्या क्या सोचता रहता है।

smt. Ajit Gupta Thu Feb 21, 09:14:00 am  

एकान्‍त मिलते ही अन्‍तर्मन के दृश्‍य प्रारम्‍भ हो जाते हैं।

Rajendra Kumar Thu Feb 21, 09:18:00 am  

बहुत ही सार्थक रचना.

डॉ. मोनिका शर्मा Thu Feb 21, 09:32:00 am  

मन के भीतर के भाव कब ठहरते हैं ....गहरी अभिव्यक्ति

ताऊ रामपुरिया Thu Feb 21, 10:00:00 am  

बहुत सुंदर रचना लिखी, आखिर मन को आराम कहां, भूत भविष्य को लेकर बस निरंतर गतिशील रहता है, बहुत शुभकामनाएं.

रामराम.

पी.सी.गोदियाल "परचेत" Thu Feb 21, 10:26:00 am  

जिन्दगी के तमाम सफ़र एक अलग नजरिये से बयां करते शब्द !

Sadhana Vaid Thu Feb 21, 10:48:00 am  

हर सफ़र के साथ मन का सफ़र भी शुरू हो जाता है कभी अतीत के जाने पहचाने स्टेशनों पर गाड़ी रुक जाती है तो कभी भविष्य के अनचीन्हे मुकाम मन को अस्थिर कर आशंकित कर जाते हैं ! निगाहें सब कुछ अपने में समेटती कल्पना और दृश्य की सेतु बनी रहती हैं ! सारगर्भित सुन्दर अभिव्यक्ति !

vandana gupta Thu Feb 21, 11:11:00 am  

यही नियति है सफ़र ज़ारी रहता है फिर चाहे पा्नी खारा हो या निगाह ठिठकी

रश्मि प्रभा... Thu Feb 21, 11:18:00 am  

संवाद - निरंतर ....
कभी प्रश्न कभी उत्तर
कहीं ठिठका मन कहीं आँखें

प्रतिभा सक्सेना Thu Feb 21, 11:32:00 am  

आँखें खुली होने का मतलब यह नहीं कि उनसे देखा जा रहा हैं,वे ठिठकी रह जायेंगी जब तक असली देखनेवाला मन अंतर्यात्रा यात्रा में व्यस्त है!

mukti Thu Feb 21, 11:37:00 am  

मेरे साथ भी अक्सर ऐसा होता है.बहुत स्वाभाविक वर्णन किया है आपने, अक्सर ट्रेन या बस से बाहर झांकती आँखों में खारा पानी उतरा होता है.

Dr (Miss) Sharad Singh Thu Feb 21, 12:13:00 pm  

चलता रहता है
संवाद मन ही मन
उतर आता है
पानी खारा
खुद से बतियाते हुये
खिड़की से झाँकती आंखे
लगता है कि ठिठक गयी हैं ।


अद्भुत...
बहुत ही मर्मस्पर्शी एवं यथार्थपरक रचना ....

सदा Thu Feb 21, 12:42:00 pm  

पर निगाहें
होती हैं स्थिर
चलता रहता है
संवाद मन ही मन
बिल्‍कुल सच ... शब्‍दश:
सादर

आशा जोगळेकर Thu Feb 21, 12:43:00 pm  

खुद से बतियाते हुये
खिड़की से झाँकती आंखे
लगता है कि ठिठक गयी हैं ।

ठहर ही जाती हैं आंखें जब मन मेंकुच खलबली मचाने वाला उठता है ।

आशा जोगळेकर Thu Feb 21, 12:43:00 pm  

खुद से बतियाते हुये
खिड़की से झाँकती आंखे
लगता है कि ठिठक गयी हैं ।

ठहर ही जाती हैं आंखें जब मन मेंकुच खलबली मचाने वाला उठता है ।

***Punam*** Thu Feb 21, 12:46:00 pm  

संवाद...
खुद से..
खुद का...!
खूबसूरत...

expression Thu Feb 21, 01:47:00 pm  

हर पल नया दृश्य देखती आँखें....
पानी क्यूँ धुंधला देता है दृष्टि...

सुन्दर रचना..

सादर
अनु

संध्या शर्मा Thu Feb 21, 02:10:00 pm  

फुरसत के पल खुद से बतियाने का अवसर देते हैं, ठिठकी आँखे लिए मन कितना शोर करता है...बहुत सुन्दर भाव... आभार

shikha varshney Thu Feb 21, 02:57:00 pm  

मन रे तू काहे न धीर धरे. सच कहा है.निगाहें बेशक ठिठकी रहें पर मन गतिशील रहता है और भर जाता है आँखों में खारा पानी.

Amrita Tanmay Thu Feb 21, 03:19:00 pm  

ठिठकी आँखों में आगत-विगत कितने ही सपने चलते हैं..

महेन्द्र श्रीवास्तव Thu Feb 21, 03:58:00 pm  

बहुत सुंदर रचना
कभी कभी ही ऐसी रचनाएं पढने को मिलती हैं।
आभार.

डॉ टी एस दराल Thu Feb 21, 06:31:00 pm  

आँखें कुछ और देखती हैं , मन कुछ और।
सुन्दर रचना।

Anita (अनिता) Thu Feb 21, 09:38:00 pm  

अक्सर ऐसा होता है...
हम सफ़र में आगे बढ़ते जाते हैं... मगर मन कहीं और पहुँचकर आँखें भिगोता रहता है....
~सादर!!!

शिवनाथ कुमार Thu Feb 21, 09:51:00 pm  

सार्थक रचना
सादर !

धीरेन्द्र सिंह भदौरिया Thu Feb 21, 11:39:00 pm  

मन हमेशा चंचल होता है,हम देखते कुछ है मन सोचता कुछ और है,,,

Recent post: गरीबी रेखा की खोज

वाणी गीत Fri Feb 22, 08:54:00 am  

जाने क्या चलता रहता है दिमाग में , खिड़की से सर टिकाये !
यही की जीवन भी बस एक सफर ही है !

मनोज कुमार Fri Feb 22, 01:20:00 pm  

एक दर्द का अद्भुत बयान।

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक (उच्चारण) Fri Feb 22, 06:10:00 pm  

श्रीमती वन्दना गुप्ता जी आज कुछ व्यस्त है। इसलिए आज मेरी पसंद के लिंकों में आपका लिंक भी चर्चा मंच पर सम्मिलित किया जा रहा है।
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (23-02-2013) के चर्चा मंच-1164 (आम आदमी कि व्यथा) पर भी होगी!
सूचनार्थ!

रेखा श्रीवास्तव Sat Feb 23, 02:36:00 pm  

man kee gati aur disha to hamesha hi adrishya hoti hai aur usase hi judi hoti hain aankhen aur chehre ke bhav.

रचना दीक्षित Sun Feb 24, 11:11:00 am  

सफर के अंदर भी एक सफर चलता रहता है.

सुंदर सशक्त प्रस्तुति.

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) Sun Feb 24, 02:50:00 pm  

होती हैं नज़रें कहीं ,और कहीं पर ध्यान
वह पल बस अपने लिये,होता है वरदान
होता है वरदान , जगत की आपाधापी
खुद से रखती दूर,बड़ी जुल्मी अति पापी
सागर बड़ा अथाह,एक दो चुन लो मोती
ठिठकी हुई निगाह ,बहुत सुखदायी होती ||

Suman Mon Feb 25, 09:53:00 am  
This comment has been removed by the author.
Suman Mon Feb 25, 09:57:00 am  

हाँ सही कहा सफ़र के दौरान ऐसा बहुत बार होता है
मन भुत,भविष्य, के ताने बाने बुनने में व्यस्त रहता है वर्तमान में कभी नहीं ठहरता मन को रोकने का ध्यान एक तरीका है जब ध्यान होता है तो मन नहीं होता है मन होता है तो ध्यान नहीं होता ....

Shikha Gupta Wed Mar 13, 12:10:00 pm  

मन में चलता संवाद और झाड़ियों पर स्थिर निगाहें ......मन में उठे बवंडर की सुंदर परिकल्पना ....वाह
मेरा ब्लॉग आपके स्वागत की प्रतीक्षा में
स्याही के बूटे

Anju Thu Mar 14, 03:30:00 pm  

मन कभी ठहरता कहाँ है ....भीड़ में हो या अकेला ....संवाद रहता है बरकरार .....भावपूर्ण ...

Dr (Miss) Sharad Singh Sat Mar 16, 12:17:00 pm  

फुटपाथ और झाड़ियाँ
पर निगाहें
होती हैं स्थिर
चलता रहता है
संवाद मन ही मन
उतर आता है
पानी खारा


हृदयस्पर्शी पंक्तियां......

डॉ. जेन्नी शबनम Fri Apr 05, 12:41:00 pm  

मन कहाँ कभी स्थिर होता है... चाहे सफ़र हो या थारा जीवन. भाव पूर्ण रचना, बधाई.

Dr.Ashutosh Mishra "Ashu" Thu Apr 11, 03:20:00 pm  

बिलकुल नैसर्गिक चित्रण ...शब्दों से बनाया गया अच्छा भाव चित्र

Kumar Radharaman Thu Apr 11, 05:22:00 pm  

ये जो सवाल हैं अनसुलझे से
कभी थिर,अस्थिर कभी
हो तलाश पूरी,कोई
मन की आंखों से देखे तो सही

Anonymous Tue Apr 16, 10:13:00 pm  

लगता है कि
देख रही हैं
फुटपाथ और झाड़ियाँ
पर निगाहें
होती हैं स्थिर
चलता रहता है
संवाद मन ही मन

Sach kaha ... aksar aisa hota hai ... aankhon ke samne kuch aur hota hai ... lekin aankhen dekhti kuch aur hi hain ....

Manju
www.manukavya.wordpress.com

Kailash Sharma Wed Apr 24, 08:04:00 pm  

बहुत भावपूर्ण रचना...

Maheshwari kaneri Thu May 02, 09:40:00 pm  

बहुत सुन्दर भावपूर्ण प्रस्तुति ..

तुषार राज रस्तोगी Wed May 08, 09:39:00 pm  

लाजवाब रचना |

कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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Dr.NISHA MAHARANA Mon May 13, 10:29:00 pm  

उतर आता है
पानी खारा sacchi bat ....

POOJA... Thu Jun 06, 10:27:00 am  

ab to thithki si nigahon mei manzar aise tairte dikhte hai, jaise ashant sagar mei ufnati lahre...

Shalini Rastogi Mon Jun 10, 08:20:00 pm  

उतर आता है
पानी खारा
खुद से बतियाते हुये
खिड़की से झाँकती आंखे
लगता है कि ठिठक गयी हैं । .. वाह , क्या सुन्दर चित्रण किया है इन्तेज़ार में खुद से ही बतियाती विह्वल आँखों का .. बहुत सुन्दर!

Bhola-Krishna Thu Jun 13, 03:36:00 am  


अति सत्य कथन !सुंदर चित्रण !====
चौदह वर्ष की अवस्था से [जब अकेले ही पहली रेल यात्रा की थी] आज [८४ वर्ष] की हवाई यात्राओं में इस आत्मा नें भी कुछ ऐसा ही अनुभव किया है !==

manukavya Thu Sep 19, 02:23:00 am  

खिड़की से झाँकती आंखे
लगता है कि ठिठक गयी हैं । ..... bahut sundar !

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