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सिर्फ एक गुज़ारिश .....

>> Wednesday, 24 November 2010




तेरी बातों की

रुखाई ने 
ला दी थी नमी 
मेरी आँखों में 
और तुमने 
बो दिए थे बीज 
कुछ उदासी के ,
अब  अंकुरित हो 
सज गए हैं वो 
खामोशी के पत्तों से .

आज जब 
बन गया है वो 
विशाल  वृक्ष 
और आ गया है 
दोनों की 
राह के बीच ,
तो चाहते हो कि
काट डाला जाये इसे .

बस एक 
गुज़ारिश है तुमसे 
कम से कम 
अब तो पर्यावरण का 
लिहाज करो ..



.

103 comments:

वन्दना Wed Nov 24, 04:16:00 pm  

बडी गहरी बात कह दी…………काश ! ये उदासी का बीज वटवृक्ष बनने से पहले ही काट दिया गया होता तो आज पर्यावरण संवर गया होता……………बेहद उम्दा प्रस्तुति।

shikha varshney Wed Nov 24, 04:17:00 pm  

आज जब
बन गया है वो
वट वृक्ष
और आ गया है
दोनों की
राह के बीच ,
तो चाहते हो कि
काट डाला जाये इसे
दी ! कभी कभी न मैं अचंभित रह जाती हूँ ,कि कैसे मन के इतने सूक्ष्म से भाव को आप इतने सटीक शब्द और अभिव्यक्ति दे देती हो ,पढकर लगता है " हाँ यही तो ..."क्या कहूँ..सब कुछ तो आपने इन पंक्तियों में कह दिया .

केवल राम Wed Nov 24, 04:17:00 pm  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो ..
सरल शव्दों में बहुत कुछ कह दिया आपने ....कवता नए बिम्बों के साथ अर्थ सम्प्रेषण में सक्षम है ..शुक्रिया

मंजुला Wed Nov 24, 04:30:00 pm  

मन के सूक्ष्म भावो का बहुत सुनार चित्रण ....

'उदय' Wed Nov 24, 04:30:00 pm  

... bahut sundar ... behatreen rachanaa !!!

मंजुला Wed Nov 24, 04:32:00 pm  
This comment has been removed by the author.
मंजुला Wed Nov 24, 04:32:00 pm  

मन के सूक्ष्म भावो का बहुत सुन्दर चित्रण ..

रश्मि प्रभा... Wed Nov 24, 04:33:00 pm  

तेरी बातों की
रुखाई ने
ला दी थी नमी
मेरी आँखों में
और तुमने
बो दिए थे बीज
कुछ उदासी के ,
अब अंकुरित हो
सज गए हैं वो
खामोशी के पत्तों से .
are baap re ... ye patte khamosh hoker kitna kuch kah gaye

ashish Wed Nov 24, 04:35:00 pm  

"न रुखाई होती ना नयन भीग पाते, कर गए वो उदास जाते जाते " . भावो से लबालब , सुन्दर बिम्ब से लदी फदी कविता .

प्रवीण पाण्डेय Wed Nov 24, 04:45:00 pm  

मन का आवरण पर्यावरण क्यों छिपाया जाये।

अनुपमा पाठक Wed Nov 24, 04:47:00 pm  

उदासी के बीज का अंकुरण....
और उसका वटवृक्ष बन जाना..!
हृदयस्पर्शी विम्ब!
सादर!

दिपाली "आब" Wed Nov 24, 05:09:00 pm  

bahut shaandar masi..
Ek baar udasi ke beej ankurit ho gaye to unka vaise b koi ilaaj nahi hai..

Love u

पी.सी.गोदियाल Wed Nov 24, 05:20:00 pm  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो..

क्या बात है , बहुत सुन्दर और गूढ़ बात कह दी आपने संगीता जी !

ज्ञानचंद मर्मज्ञ Wed Nov 24, 05:30:00 pm  

जीवन की अभिव्यक्ति को इस तरह पर्यावरण से जोड़ देना बस आप के ही बस की बात है !
आपकी इस भावपूर्ण रचना ने मन को छू लिया !
बधाई हो !
-ज्ञानचंद मर्मज्ञ

deepak saini Wed Nov 24, 05:36:00 pm  

मन के कोमल भाव को पर्यावरण के बिम्ब से प्रस्तुति
बहुत सुन्दर लगी, सरल शब्दो मे बहुत गहरी बात कह
दी, भावभिनी रचना के लिए बधाई ।

Udan Tashtari Wed Nov 24, 06:01:00 pm  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो ..


-शानदार!!

शोभना चौरे Wed Nov 24, 06:04:00 pm  

anusarniy gujarish .
bahut sundar bhavo ki gujarish
abhar

राजकुमार सोनी Wed Nov 24, 06:10:00 pm  

हमेशा की तरह आपने जनहित को सबसे पहले महत्व दिया। काफी गहरी बात है।

Dr. Ashok palmist blog Wed Nov 24, 06:16:00 pm  

बहुत ही शानदार भावोँ को संजोया है आपने कविता मेँ। बहुत - बहुत आभार दी!

फ़िरदौस ख़ान Wed Nov 24, 06:18:00 pm  

तेरी बातों की


रुखाई ने
ला दी थी नमी
मेरी आँखों में
और तुमने
बो दिए थे बीज
कुछ उदासी के ,
अब अंकुरित हो
सज गए हैं वो
खामोशी के पत्तों से

मन को छू लेने वाली रचना...

kshama Wed Nov 24, 06:21:00 pm  

Aaj bhi gar ham apni kuchh oorja paryawaran ke liye arpan karen to thodi bahut uski raksha ho sakti hai!

Vandana ! ! ! Wed Nov 24, 06:37:00 pm  

अंतिम पंक्तियों ने मन मोह लिया. मन के भावों का इतना ख़ूबसूरत चित्रण!

सम्वेदना के स्वर Wed Nov 24, 06:40:00 pm  

उदासी का बरगद और प्रेम का पर्यावरण... मुझे नहीं लगता कि पहले किसी ने ऐसी सोच बयान की होगी!! संगीता दी! आज बस मज़ा आ गया!!!

क्षितिजा .... Wed Nov 24, 07:04:00 pm  

आज जब
बन गया है वो
वट वृक्ष
और आ गया है
दोनों की
राह के बीच ,
तो चाहते हो कि
काट डाला जाये इसे ....

गहरी बात कही है आपने ... बहुत खूब .... बहुत खूबसूरत नज़्म संगीता जी ...

निर्मला कपिला Wed Nov 24, 07:19:00 pm  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो ..
वाह संगीता जी सच मे ही रिश्तों का पर्यावरण दिन व दिन दूशित होता जा रहा है। बहुत सुन्दर ,दिल को छूने वाली अभिव्यक्ति है। शुभकामनायें।

धीरेन्द्र सिंह Wed Nov 24, 07:26:00 pm  

ख़ामोशी के पत्तों सजना और वट वृक्ष बन जाना आधुनिक जीवन की अक्सर घटित होनेवाली घटना है . सबसे ज्यादा आश्चर्य हुवा नारी के दो रूपों को देखकर जब ख़ामोशी के पत्ते सज रहे थे तब वह भी खामोश थी शायद किसी उम्मीद में किन्तु वट वृक्ष बन जाने के बाद कितनी दृढ़ता से अपनी बात रख रही है, नकार रही है, अस्वीकृत कर रही है. नारी का सशक्त चित्रण है .

Dorothy Wed Nov 24, 07:29:00 pm  

आज जब
बन गया है वो
वट वृक्ष
और आ गया है
दोनों की
राह के बीच ,
तो चाहते हो कि
काट डाला जाये इसे

गहन अर्थों और आयामों को समेटे बेहद मर्मस्पर्शी अभिव्यक्ति. आभार.
सादर
डोरोथी.

Shekhar Suman Wed Nov 24, 07:42:00 pm  

बहुत ही खुबसूरत कविता संगीता जी....
आपका लेखन हमेशा से ही प्रभावी रहा है ....

ताऊ रामपुरिया Wed Nov 24, 08:13:00 pm  

बहुत ही सुंदर और लाजवाब भाव. प्रणाम.

रामराम.

अनामिका की सदायें ...... Wed Nov 24, 08:40:00 pm  

काश वो उदासी के बीजों से अंकुरित छायादार वटवृक्ष ही होता....

सीख देती रचना.

Thakur M.Islam Vinay Wed Nov 24, 09:02:00 pm  

dil to chahta hai teri god sitaron se bharun- mere daman men to gurbat ke siwa kuch bhi nahi

Sadhana Vaid Wed Nov 24, 09:27:00 pm  

हमेशा की तरह बहुत सुन्दर और भावपूर्ण रचना ! एक नाज़ुक सा ख्याल लेकिन बहुत सशक्त एवं प्रभावी अभिव्यक्ति ! संगीताजी आपको इतनी बढ़िया प्रस्तुति के लिये ढेर सारी बधाइयां और शुभकामनाएं !

Parul Wed Nov 24, 09:54:00 pm  

ye gujaarish kabile gaur hai!

अरुण चन्द्र रॉय Wed Nov 24, 10:32:00 pm  

प्रेम पर्यावरण का अदभुद समन्वय . सुन्दर कविता..

रानीविशाल Wed Nov 24, 11:31:00 pm  

कितनी आसानी से इतनी बड़ी बड़ी बातें कह देती है आप अपनी अभिव्यक्तियों में ....भाव प्रधान रचनाओं की धनी तो है ही , शब्द भी चुन चुन कर संजोती है ....आभार

Anjana (Gudia) Thu Nov 25, 12:32:00 am  

bahut hi sunder likhti hain aap... bahut sunder chitran rishton ki haquikat ka..!

वन्दना अवस्थी दुबे Thu Nov 25, 12:39:00 am  

क्या बात है संगीता जी.

डॉ. नूतन - नीति Thu Nov 25, 01:06:00 am  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो ...सुन्दर अभिव्यक्ति..
खामोशियों में पनपे पर्यावरण में बाते करना कितना असहज सा हो जाता है.. जब मौन एक आदत बन जाये... इस भावना को बहुत सुन्दर अलफ़ाज़ में बयाँ किया संगीता जी ने.. बहुत खूब..

saanjh Thu Nov 25, 09:28:00 am  

kya khoob nazm hai dadi....what an image...aur aakhir ka twist...killer!! tooooo good dadi...amazing :)

Mukesh Kumar Sinha Thu Nov 25, 10:12:00 am  

कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो ..


ye ab kab hoga di.....:(
aapke chhote chhote kshhando me sab kuchh kaise sama jata hai..!!

Di aap bahut dino se mere blog pe nahi aa rahe ho..........ye meri sikayat hai aapse:D

ZEAL Thu Nov 25, 11:06:00 am  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो --

----

behatreen abhivyakti .

.

ajit gupta Thu Nov 25, 11:19:00 am  

संगीता जी, कविता नि:संदेह बहुत अच्‍छी है। बस एक बात खटकती है उसे बताना आवश्‍यक समझ रही हूँ इसलिए बता रही हूँ, कृपया अन्‍यथा ना लें। वटवृक्ष भारतीय राष्‍ट्रीय वृक्ष है, इसलिए इसे काटने पर पाबन्‍दी है। यह पेड़ हमारे पारिवारि‍क जीवन और संस्‍कृति का परिचायक भी है इसलिए कभी भी किसी की राह का रोडा नहीं बनता। आप यदि वटवृक्ष के स्‍थान पर झाड़ शब्‍द का प्रयोग करेंगी तो आपत्ति रहित हो जाएगा।

संगीता स्वरुप ( गीत ) Thu Nov 25, 11:33:00 am  

सभी पाठकों का हृदय से आभार ...

@@ अजीत जी ,

बहुत बहुत शुक्रिया ..इस बात पर ध्यान दिलाने का ..वैसे मुझे लगा था कि शायद पीपल का ही पेड़ लोंग नहीं काटते ...मैंने शब्द बदल दिया है ..आभार

Poorviya Thu Nov 25, 11:42:00 am  

अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो ..

वाणी गीत Thu Nov 25, 11:54:00 am  

उदासी के बीज को इतना बड़ा होने ही क्यूँ दिया ...
अनूठी सी कल्पना ...!

डा. अरुणा कपूर. Thu Nov 25, 12:04:00 pm  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो ..

bahut badhhiya gujaarish hai yeh!..paryaavaran ko banaae rakhane ke liye!

sada Thu Nov 25, 12:32:00 pm  

आज जब
बन गया है वो
विशाल वृक्ष

बहुत ही गहरी बात ....भावमय करती प्रस्‍तुति ।

Dr (Miss) Sharad Singh Thu Nov 25, 12:50:00 pm  

गीत अत्यन्त भावपूर्ण है। बधाई।

मनोज कुमार Thu Nov 25, 01:55:00 pm  

देरी का दंड तो यही है कि कम शब्दों में अपनी बात रखी जाए। बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!
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अरविन्द जांगिड Thu Nov 25, 01:55:00 pm  

हमेशा कि तरह लाजवाब रचना के लिए मैडम जी का आत्मीय धन्यवाद.

एस.एम.मासूम Thu Nov 25, 02:06:00 pm  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो

अच्छा विषय चुना है

स्वप्निल कुमार 'आतिश' Thu Nov 25, 03:13:00 pm  

are mummaa..kamal hai ye to ....bahut badhiya nazm hai ... aapne kai paryavarnon kee bat kar di ..admee ke bheetar kee bhi ..admi ke bahar ki bhi ...:) shaandar nazm hai

Taru Thu Nov 25, 04:23:00 pm  

wowwwwwwwww...ending to kamaal hai....:):)
achhi poem Mumma........shuru wala para bahut achha hai....khamoshi k patton wala..:)

daanish Thu Nov 25, 08:01:00 pm  

उदासी और बेरुखी के
विशाल वृक्ष का बीच राह में आ खडा होना
उस पर पर्यावरण की चिंता
मननीय है ....
भावपूर्ण कृति के लिए अभिवादन
और शुभकामनाओं के लिए शुक्रिया .

कुमार राधारमण Thu Nov 25, 08:39:00 pm  

इन्हीं भावों को ओशो सिद्धार्थ इन शब्दों में व्यक्त करते हैं-
"है कलह उत्स पर क्षीण धार
तुम रूप नदी का देते हो
फिर बाढ़ कभी जो आ जाती
तुम गंवा सभी कुछ रोते हो"

POOJA... Thu Nov 25, 09:13:00 pm  

गहरी सोच... प्यारी रचना...

कविता रावत Fri Nov 26, 06:05:00 pm  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो --
...sach mein ab nahi sambhle to phir sabhalne ka mauka nikal jaayega.. parayawan jaagrati bahut aawasyak ban gaya hai... is disha mein saarthak prasuti ke liye aabhar

रचना दीक्षित Fri Nov 26, 06:31:00 pm  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो --
बेहद उम्दा प्रस्तुति।

"अभियान भारतीय" Fri Nov 26, 07:42:00 pm  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो ..
वाह इन पंक्तियों ने तो जैसे सब कुछ कह दिया.....
बेहतरीन और शानदार रचना के लिए बधाई स्वीकार करें |

डा. अरुणा कपूर. Fri Nov 26, 10:13:00 pm  

तेरी बातों की
रुखाई ने
ला दी थी नमी
मेरी आँखों में

....wah!...kitne sundar shabd!

Dr (Miss) Sharad Singh Fri Nov 26, 10:28:00 pm  

कम से कम, अब तो पर्यावरण का ,लिहाज करो ..सचमुच बहुत अच्छी पंक्तियां हैं। बधाई!

डॉ. हरदीप संधु Sat Nov 27, 01:12:00 am  

बहुत ही सुन्दर पंक्तिया लिखी है आपने ...
शुभकामनाएं

lokendra singh rajput Sat Nov 27, 01:42:00 am  

उम्दा रचना.....

शरद कोकास Sat Nov 27, 05:35:00 pm  

प्रेम और पर्यावरण को बहुत खूबसूरती से जोडा है आपने

M VERMA Sat Nov 27, 07:35:00 pm  

आपकी रचनाओं की सूक्ष्मता और उसके बारीक भाव अत्यंत मुग्ध करने वाले होते हैं.

वृक्ष कटना यूँ तो पर्यावरणीय क्षति हैं पर गर उदासी के हैं तो कट ही जायें तो अच्छा.

Suman Sun Nov 28, 01:22:00 pm  

sangita ji apki har rachna mere dil ke bhitar tak chhu jati hai.kam shabdo me bahut kuch kahana apki rachnavonki visheshta mujhe bahut achhi lagi..........

अशोक बजाज Sun Nov 28, 04:32:00 pm  

बेहद उम्दा प्रस्तुति !

अर्चना तिवारी Sun Nov 28, 06:01:00 pm  

बहुत सुंदर मार्मिक रचना...दिल को छू जाने वाली

सुमन'मीत' Sun Nov 28, 07:18:00 pm  

भावपूर्ण अभिव्यक्ति.............

Manav Mehta Sun Nov 28, 07:47:00 pm  

बेहद भावपूर्ण अभिव्यक्ति.........

http://saaransh-ek-ant.blogspot.com

shantanu sanyal Sun Nov 28, 10:58:00 pm  

खुबसूरत रचना -- दिल की गहराइयों को छूती हुई - सस्नेह

shantanu sanyal Sun Nov 28, 11:04:00 pm  

आपकी रचनाओं में एक सुन्दर भाव प्रलक्षित होता है -- यूँ लगता है जैसे कोई सांध्य प्रदीप तुलसी तले स्निग्ध रूप से प्रज्वलित है- अभिनन्दन सह /

सतीश सक्सेना Mon Nov 29, 12:58:00 pm  

बहुत खूब .....शुभकामनायें आपको !

Indranil Bhattacharjee ........."सैल" Mon Nov 29, 04:30:00 pm  

तेरी बातों की
रुखाई ने
ला दी थी नमी
मेरी आँखों में
और तुमने
बो दिए थे बीज
कुछ उदासी के ,
अब अंकुरित हो
सज गए हैं वो
खामोशी के पत्तों से .


behatreen panktiyan !

केवल राम Mon Nov 29, 04:49:00 pm  

बहुत - बहुत आभार संगीता जी , आपने इस काबिल समझा ..यकीन नहीं हो रहा है, अभी तो कल ही तो मैंने चर्चा मंच पर अपने ब्लॉग को रजिस्टर किया था ..आपके इस स्नेह से मैं अभिभूत हूँ ..बहुत- बहुत धन्यवाद

ज़मीर Mon Nov 29, 10:29:00 pm  

बहुत ही सुन्दर रचना.

इमरान अंसारी Tue Nov 30, 01:18:00 pm  

संगीता जी,

देर से आने की माफ़ी चाहता हूँ मुझे नहीं पता था की आप अपना ब्लॉग लिखती हैं मैंने सोचा शायद चर्चामंच ही....

बहुत सुन्दर लगी कविता....और अंत बहुत खूब किया आपने ....कुछ तो पर्यावरण का लिहाज़ करो.....वाह बहुत सुन्दर|

रेखा श्रीवास्तव Tue Nov 30, 06:29:00 pm  

बहुत सुंदर, आपके भावों का सागर ऐसे ठाठें मारता है कि पता नहीं कैसे कैसे मोti किनारे पर लाकर छोड़ जाता है और हम उनको निहारा करते हैं और सराहा करे हैं.

Amrita Tanmay Wed Dec 01, 03:54:00 pm  

आपका, बेहद खूबसूरती के साथ ...नरमी से जज्बातों को रखना दिल को छू जाता है . बहुत सुन्दर ...

देवेन्द्र पाण्डेय Wed Dec 01, 07:25:00 pm  

उदासी के वृक्ष को तो जब मौका मिले तब काट देना चाहिए। इससे पर्यावरण की रक्षा होगी। जैसे जहरीले वृक्षों को काटने से होती है।

आशीष/ ਆਸ਼ੀਸ਼ / ASHISH Thu Dec 02, 08:01:00 am  

संगीता माँ,
नमन है आपको!
पहले शिकायत के उदासी का वृक्ष बीज दिया, और अब पर्यावरण की दुहाई जब पेड़ काटने की बारी आयी!
मानना पड़ेगा....
आशीष
--
नौकरी इज़ नौकरी!

मेरे भाव Thu Dec 02, 02:35:00 pm  

तेरी बातों की
रुखाई ने
ला दी थी नमी
मेरी आँखों में
और तुमने
बो दिए थे बीज
कुछ उदासी के ,
अब अंकुरित हो
सज गए हैं वो
खामोशी के पत्तों से .
.....
ख़ामोशी की दास्ताँ गहरे अर्थ लिए हैं. शुभकामना .

anita saxena Fri Dec 03, 07:17:00 pm  

बहुत सुंदर ,......इतना दर्द समेटे है यह रचना कि पर्यावरण एक अवरोध सा लगता है !

ѕнαιя ∂я. ѕαηנαу ∂αηι Fri Dec 03, 11:30:00 pm  

कम से कम पर्यावरण का तो लिहाज़ करो।
बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

KK Yadava Sat Dec 04, 04:52:00 pm  

बस एक
गुज़ारिश है तुमसे
कम से कम
अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो ..

...Bahut sarthak sandesh...Nice one !!

dr.sushila gupta Sat Dec 04, 07:12:00 pm  

आज जब
बन गया है वो
विशाल वृक्ष
और आ गया है
दोनों की
राह के बीच ,
तो चाहते हो कि
काट डाला जाये इसे .

wah............sangeetaji.......dil ko choo gaee ye lines

अपर्णा "पलाश" Sun Dec 05, 12:05:00 am  

कितनी खूबसूरती से आपने संदेश दिया
आपकी गुजारिश का हमेशा ख्याल रखूंगी

JAGDISH BALI Sun Dec 05, 11:48:00 am  

Beautiful really ! i am following u. pl follow me.

anjana Sun Dec 05, 09:41:00 pm  

उम्दा प्रस्तुति............

वीना Sun Dec 05, 10:28:00 pm  

बहुत सुंदर मार्मिक रचना...प्रेम के माध्यम से बहुत खूबसूरत संदेश

विनोद कुमार पांडेय Tue Dec 07, 10:34:00 pm  

आज जब
बन गया है वो
विशाल वृक्ष
और आ गया है
दोनों की
राह के बीच ,
तो चाहते हो कि
काट डाला जाये इसे

उपर्युक्त पंक्तियों का कोई जवाब नही...एक बेहतरीन भाव समेटे हुए सुंदर रचना...बधाई स्वीकारें संगीता जी

***Punam*** Wed Dec 08, 01:36:00 am  

ankhon main nami lane wale ko ye ehsaas nahi hota ki vo udasi ke beez bo raha hai,lekin jab vriksh bada ho jata hai tab vo hi kaat dalna bhi chahta hai...per tab tak us vriksh ki na jane kitni shakhayen nikal chuki hoti hain...yatharth ke bahut hi nazdeek apki kavita hai..shukriya !!

DR. ANWER JAMAL Thu Dec 09, 09:07:00 pm  

Nice post .
औरत की बदहाली और उसके तमाम कारणों को बयान करने के लिए एक टिप्पणी तो क्या, पूरा एक लेख भी नाकाफ़ी है। उसमें केवल सूक्ष्म संकेत ही आ पाते हैं। ये दोनों टिप्पणियां भी समस्या के दो अलग कोण पाठक के सामने रखती हैं।
मैं बहन रेखा जी की टिप्पणी से सहमत हूं और मुझे उम्मीद है वे भी मेरे लेख की भावना और सुझाव से सहमत होंगी और उनके जैसी मेरी दूसरी बहनें भी।
औरत सरापा मुहब्बत है। वह सबको मुहब्बत देती है और बदले में भी फ़क़त वही चाहती है जो कि वह देती है। क्या मर्द औरत को वह तक भी लौटाने में असमर्थ है जो कि वह औरत से हमेशा पाता आया है और भरपूर पाता आया है ?

rafat Mon Dec 13, 01:23:00 pm  

अब तो पर्यावरण का
लिहाज करो ..वाह मोहतरमा अनूठा ख्याल है

Anita Mon Dec 13, 01:59:00 pm  

संगीता जी, आपकी सुंदर कविता के लिये यह सौवीं टिप्पणी है , सो पहले तो बधाई स्वीकारें, आप सचमुच ब्लॉग जगत में एक प्रेरणा स्रोत बन गयी हैं !

Sachin Malhotra Tue Jun 28, 08:23:00 pm  

एक अदभुत रचना ..बहुत ही बढ़िया लिखा है !
मेरी नयी पोस्ट पर आपका स्वागत है : Blind Devotion - सम्पूर्ण प्रेम...(Complete Love)

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