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भ्रष्ट आचार

>> Friday, 25 October 2013




स्वतंत्र भारत की नीव में
उस समय के नेताओं ने 
अपनी महत्त्वाकांक्षाओं  के 
रख दिये थे भ्रष्ट  आचार 
फिर  देश से कैसे 
खत्म हो  भ्रष्टाचार ? 


आहार बनाम हार

>> Thursday, 18 July 2013


आहार नाम 
हार गया जीवन 
कैसी है नीति ? 


बालक शव 
ममता का चीत्कार
है राजनीति ।


कैसी है शिक्षा 
नहीं लौटेगा लाल 
मारा तृष्णा ने । 


मौन हैं नेता 
विपक्ष पर वार 
स्वयं हैं पाक । 


शर्मिंदगी से 
सिर झुकाये सभी 
आंखे सजल ।

प्रकोप शिव का ....

>> Sunday, 23 June 2013


त्रिनेत्रधारी 
त्रिनेत्र  बंद करो 
राहत मिले 


नाथों के नाथ 
क्यों प्रलय मचाई 
मूक बन के ।
 

त्राहि त्राहि है 
हैरान परेशान 
हैं तीर्थ यात्री

Uttarakhand: pilgrims trekking to safety being looted en route

आपदा में भी 
सक्रिय हैं लुटेरे 
जन हैरान । 

Uttarakhand: 'Will we be evacuated after we die?' ask those stranded

खामोश नेता 
रोटियाँ सेंकते हैं 
ढेर लाशों के । 


वीर जवान 
लगा दें सारी जान 
उन्हें नमन 

Uttarakhand: 550 people dead, 14,000 still missing

हवाई दौरा 
कर्तव्य की इतिश्री 
नेता अभ्यस्त  । 


भगवान ने 
दिखा दिया भक्तों को 
अपना दर्द ।

kedarnath-21.wmv_000020534.jpg

भोले भण्डारी 
किया तांडव नृत्य 
तबाही मची । 


मानव बुद्धि 
अब तो  कर  शुद्धि 
विचार कर । 

सुदृढ़ बाहें ...... ( पितृदिवस पर कुछ हाइकु )

>> Sunday, 16 June 2013


विशाल वृक्ष 
जैसे देता है छाया 
पिता ही तो हैं । 





पिता की गोदी 
आश्रय संबल का 
डर भला क्यों ? 
Father and Daughter Climbing Stairs    Stock Photo - Premium Rights-Managed, Artist: Peter Griffith, Code: 700-00549953

पिता का डर 
रखे    अनुशासित 
चढ़े सोपान । 

सुदृढ़ बाहें 
आशवस्त है  मन 
पिता  तो हैं ही । 

पिता का साया 
हर बच्चे को मिले 
यही है दुआ । 

पिता का हाथ 
विशाल बरगद 
सुकून मिले । 

तल्ख स्मृतियाँ ( हाइकु )

>> Tuesday, 14 May 2013



कड़वी यादें 
  चीर देती हैं  सीना 
     मैं हुयी मौन  ।

************

पीड़ित यादें 
  झटक ही तो दीं थीं
    पीले पत्ते सी । 

******************

विष से बुझा 
  याद है  व्यंग्य  बाण
     मरा मेरा   'मैं' ।

*****************

तल्ख स्मृतियाँ 
   जेहन में घूमतीं 
      चैन न आए । 

*****************

खुद से जंग 
  जंगरहित यादें 
     निज़ात नहीं .... 

***************


सच ठिठकी निगाहों का

>> Thursday, 21 February 2013


सफर के दौरान 
खिड़की से सिर टिकाये 
ठिठकी सी निगाहें 
लगता है कि 
देख रही हैं 
फुटपाथ और झाड़ियाँ 
पर निगाहें 
होती हैं स्थिर 
चलता रहता है  
संवाद मन ही मन 
उतर आता है 
पानी खारा 
खुद से बतियाते हुये 
खिड़की से झाँकती आंखे 
लगता है कि ठिठक गयी हैं । 

शगल ....

>> Friday, 1 February 2013




मेरे मन के समंदर में
तुमने उछाल दिये 
बस यूं ही 
कुछ शब्दों के पत्थर 
और देखते रहे 
उनसे बने घेरे 
जो भावनाओं की लहरों पर 
बन औ  बिगड़ रहे थे 
शायद  तुम्हारा तो मात्र 
यह शगल रहा था 
पर वो पत्थर 
समंदर में कहीं 
गहरा गड़ा  था ।


 

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