पलाश
>> Friday, 18 March 2011
पलक पर जमी
शबनम की बूंद को
तर्जनी पर ले कर
जैसे ही तुमने चूमा
मेरी आँखों में
न जाने कितने
पलाश खिल गए ....
खलिश होती है तो यूँ ही बयां होती है , हर शेर जैसे सीप से निकला हुआ मोती है

मन की अगन को
बढा देती हैं
काम , क्रोध,
मोह , लोभ
की आहुतियाँ .
बढ़ाना है
गर इसको
तो
बहानी होगी
प्रेम की निर्मल धारा .
बढाने के दो अर्थ हैं --
१--- अधिक करना
२-- बुझाना

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