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वजूद

>> Thursday, 11 March 2010



वजूद के टुकड़े

क्या बांटेंगी

उदास शामें

और ग़मज़दा रातें




जिसने

टुकड़े टुकड़े

जोड़ कर ही

बनाया हो

वजूद अपना .




21 comments:

Apanatva Thu Mar 11, 01:00:00 pm  

chtr kavita ek doosare ke poorak hai...........

ताऊ रामपुरिया Thu Mar 11, 02:01:00 pm  

बिल्कुल सही और सटीक फ़रमाया आपने. बहुत खूबसूरत रचना.

रामराम.

shikha varshney Thu Mar 11, 03:28:00 pm  

ओये क्या बात है ...टुकड़े टुकड़े जोड़ कर बना वजूद...माशाल्लाह..

Mithilesh dubey Thu Mar 11, 04:12:00 pm  

वाह , बहुत खूब ।

निर्मला कपिला Thu Mar 11, 04:38:00 pm  

बहुत खूब और सटीक अभिव्यक्ति। शुभकामनायें

रचना दीक्षित Thu Mar 11, 05:59:00 pm  

सच ही कहा आपने हम सभी टुकड़े टुकड़े जोड़ कर ही अपना वजूद बना पाए हैं और फोटो तो क्या कहने!!!!!!!!!1

अनामिका की सदाये...... Thu Mar 11, 06:45:00 pm  

वाह पहले से ही इतना मंजा हुआ है वजूद...
बढ़िया है...सर्दी /गर्मी/ आंधी/तूफान का कोई असर नहीं पड़ेगा.

Deepak Shukla Fri Mar 12, 07:30:00 am  

Hi..
Kam shabdon main dil chhu lene vali kavita..

Tukdon main to banta jeevan hai..
Tukdon main hi rahna hai..
Gam ki raatain ya fir din hon..
Dard sabhi ko sahna hai..

DEEPAK SHUKLA..

rashmi ravija Fri Mar 12, 03:55:00 pm  

sach bayaan kar diyaa aapne,in panktiyon me...sach tukde tukde sanjo kar hi ek vajood ban paata hai..

अक्षिता (पाखी) Fri Mar 12, 04:49:00 pm  

बहुत सुन्दर लिखा...बेहतरीन रचना !!
______________

"पाखी की दुनिया" में देखिये "आपका बचा खाना किसी बच्चे की जिंदगी है".

Babli Sat Mar 13, 09:16:00 pm  

अद्भुत सुन्दर रचना! बेहद पसंद आया!

Ashish (Ashu) Sat Mar 13, 11:09:00 pm  

अति सुन्दर प्रस्तुति.
बहुत सुंदर शव्दो से सजाया है आप ने इस सुंदर कविता को.बहुत सुंदर
धन्यवाद

JHAROKHA Sun Mar 14, 09:32:00 pm  

sangeeta ji, bahut hi sadhe shabdon me bahut sachchi bat kahi aapane.itni khubsurat rachna ke liye badhai..
poonam

psingh Mon Mar 15, 01:09:00 pm  

sundar prastuti
abhar........

'अदा' Tue Mar 16, 07:30:00 am  

waah..!!
bahut khoob...
kya baateingi ye gumzada shaam vajood ko tukdon mein...
behtareen..
aabhaar..

हरकीरत ' हीर' Tue Mar 16, 11:57:00 am  

टुकड़ों-टुकड़ों में वजूद बचता ही कहाँ है संगीता जी ........!!

sangeeta swarup Wed Mar 17, 11:45:00 pm  

अदा जी,
उदास शाम और गमज़दा रातें ...:):) कहाँ रह पता है फिर वजूद ?? :):)


हरिकीरत हीर जी ,

नारी का वजूद तो ना जाने कितने टुकड़ों में बंटा रहता है..सब टुकड़े मिल कर ही तो नारी को गढते हैं...

आप सभी का आभार ...इस ख़याल को सराहने का

Mukesh Kumar Sinha Thu Mar 18, 09:53:00 am  

udas saam aur gamjada raaten..........bahut khub ...........:)

Ravindra Ravi Tue Apr 06, 11:24:00 pm  

बहुत ही सुंदर रचना! सचमुच तुकडे तुकडे जोडकर ही तो बना है वजूद अपना .

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