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कल्पना का इन्द्रधनुष

>> Wednesday, 24 March 2010


कल्पना के



इन्द्रधनुष को


किसी क्षितिज की


दरकार नहीं


ये तो


उग आते हैं


मन के


आँगन के


किसी कोने में ....


http://blog4varta.blogspot.com/2010/03/4_25.html

20 comments:

संजय भास्कर Wed Mar 24, 11:25:00 pm  

हर शब्‍द में गहराई, बहुत ही बेहतरीन प्रस्‍तुति ।

shikha varshney Wed Mar 24, 11:30:00 pm  

सच दी ! कल्पना को कोई जगह नहीं चाहिए होती पनपने के लिए ...बेहद सुन्दर अभिव्यक्ति है.और कल्पना कि तुलना इन्द्रधनुष से तो कमाल है

Udan Tashtari Thu Mar 25, 01:07:00 am  

बिल्कुल सही!! बहुत बढ़िया शब्द दिये.

Apanatva Thu Mar 25, 05:03:00 am  

bahut sunderaur solah aane sahee baat....

roohshine Thu Mar 25, 09:04:00 am  

Sundar :) ..bilkul indradhanush ki tarah

रचना दीक्षित Thu Mar 25, 12:32:00 pm  

वाह संगीता जी वाह !!!!!!!!क्या बात कही है बिलकुल सच और दिल के क़रीब

rashmi ravija Thu Mar 25, 12:57:00 pm  

सच...कल्पना के इन्द्रधनुष को किसी चीज़ की दरकार नहीं कहीं भी किसी के मन में कभी भी उग आ सकते हैं

ताऊ रामपुरिया Thu Mar 25, 04:02:00 pm  

बहुत गहरे और सुंदर भाव.

रामराम.

अनामिका की सदाये...... Thu Mar 25, 05:34:00 pm  

कल्पना जो ठहरी ...अच्छी प्रस्तुति

दीपक 'मशाल' Fri Mar 26, 06:09:00 am  

और ख़ास बात ये भी है की इसमें गिने-चुने सात नहीं बल्कि अनगिनत होते हैं रंग..

पी.सी.गोदियाल Fri Mar 26, 12:18:00 pm  

ये तो उग आते हैं मन के आँगन के किसी कोने में
लाजबाब भाव , बहुत सुन्दर !

Babli Fri Mar 26, 05:10:00 pm  

बहुत ही गहराई के साथ आपने बिल्कुल सही फ़रमाया है! बहुत सुन्दर रचना!

nilesh mathur Sat Mar 27, 02:33:00 am  

नमस्कार, आज आपकी कई कविताएँ पढ़ी, वैसे भी छोटी कविताएँ मुझे पसंद हैं, बहुत ही कम और सरल शब्दों में आप अपनी बात कह देती हैं, आपको पढ़ कर अच्छा लगा!

Arvind Mishra Mon Mar 29, 08:22:00 am  

संक्षिप्त किन्तु सशक्त अभिव्यक्ति -विस्तृत नभ के कोने मन के वितान की वामन परिधि में नही तो समो गये हैं !

शहरोज़ Mon Mar 29, 07:47:00 pm  

आप बेहतर लिख रहे/रहीं हैं .आपकी हर पोस्ट यह निशानदेही करती है कि आप एक जागरूक और प्रतिबद्ध रचनाकार हैं जिसे रोज़ रोज़ क्षरित होती इंसानियत उद्वेलित कर देती है.वरना ब्लॉग-जगत में आज हर कहीं फ़ासीवाद परवरिश पाता दिखाई देता है.
हम साथी दिनों से ऐसे अग्रीग्रटर की तलाश में थे.जहां सिर्फ हमख्याल और हमज़बाँ लोग शामिल हों.तो आज यह मंच बन गया.इसका पता है http://hamzabaan.feedcluster.com/

Sleepless Mon Mar 29, 07:59:00 pm  

Wow.After hearing from Shipra about your blogs i thought i will have look and after going through this i can simply say you are really good.Even though I was your student still my hindi is not great still i will try to say "बहुत ही सुन्दर भाव थे आपकी कविता मे , कल्पना कि तुलना ईन्द्रधनुश से लाजावाब थी"
-Hitesh

सुमन'मीत' Tue Mar 30, 11:28:00 am  

कल्पना की दुनियां के रंग अमिट होते है बिल्कुल आपकी इस कविता की तरह

आशीष/ ASHISH Tue Mar 30, 07:31:00 pm  

Maze ki baat to yeh hai Sangeete ji, kalpana ke indrdhanush ko baarish aur phir dhoop ki bhi darkaar nahin!
Aur rangon mein bhi ye ginti ka mohtaaj nahin!
Saadhuwaad!

Suman Tue Sep 14, 02:42:00 pm  

sahi hai.........bahut sunder kavita.

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