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इल्जाम

>> Thursday, 16 October 2008

सीने मैं दर्द को दफ़न हम यूँ कर रहे हैं,
कि जहाँ के साथ हम भी हंस रहे हैं,
इस आशियाने मैं पतंगे की माफिक जल रहे हैं,
और इल्जाम हम पर ही कि हम क्यों मर रहे हैं।

1 comments:

Anamika Thu Apr 16, 12:49:00 pm  

maro na e jaanaa..mere paas aao
dard sine ka mujhse na chhupao..
jalna he to aao pyaar me jal jaaye..
zindgi k vark pe muhobbat ko amar kar jaye..!!

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